बीजेपी पर राज्य की उपेक्षा और वादाखिलाफी का आरोप
गैरसैंण/चमोली: उत्तराखंड राज्य स्थापना की 25वीं रजत जयंती के अवसर पर कांग्रेस ने ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण में शक्ति प्रदर्शन किया। नगर पंचायत अध्यक्ष मोहन भंडारी के नेतृत्व में तिरंगा रैली, सांस्कृतिक कार्यक्रम और राज्य आंदोलनकारियों का सम्मान कार्यक्रम आयोजित किया गया। वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली को याद करते हुए नेताओं ने उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण किया।
कार्यक्रम में महिला मंगल दलों ने लोक-संस्कृति की शानदार प्रस्तुतियों से माहौल को उत्सवमय बनाया। पूरे गैरसैंण में तिरंगे के साथ हजारों लोगों की भागीदारी देखते ही बनी।
“स्थायी राजधानी का वादा भूली भाजपा” — कांग्रेस
कार्यक्रम में पहुंचे कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने भाजपा सरकार को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
ललित फर्स्वाण ने कहा—
“गैरसैंण की हालात राज्य सरकार के विकास के दावों की पोल खोलती है। जनता सही वक्त पर जवाब देगी।”
मोहन भंडारी बोले—
“शहीदों के सपनों को भुला दिया गया है। अब इस उपेक्षा को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।”
लखपत बुटोला ने आरोप लगाया—
“भाजपा ने स्थायी राजधानी के मुद्दे पर जनता को ठगा है। बेरोजगारी और महंगाई चरम पर है।”
मनोज रावत ने कहा—
“राज्य की भूमि लूट में दे दी गई, अब योजनाओं के लिए जमीन नहीं बची।”
50 करोड़ रुपए का हिसाब दो — कुंजवाल
पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल ने सरकार पर गंभीर प्रश्न उठाए—
“कांग्रेस शासन में गैरसैंण सचिवालय निर्माण के लिए 50 करोड़ स्वीकृत किए गए थे, लेकिन भाजपा ने काम रोक दिया। पैसा कहाँ गया?”
“उपेक्षा अब और नहीं” — कांग्रेस
जिला अध्यक्ष मुकेश नेगी बोले—
“अगर सरकार गंभीर होती तो पूरा मंत्रिमंडल आज यहां मौजूद होता।”
गणेश गोदियाल ने सरकार पर बोला हमला
पूर्व प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने कहा—
“25 साल बाद भी गैरसैंण में सरकार एक इंच भी आगे नहीं बढ़ी। जिस भावना के साथ उत्तराखंड राज्य बना, उसे साकार करना अब जरूरी है।”
उन्होंने आगे कहा—
“अग्निवीर योजना पर भाजपा ने युवाओं को भ्रमित किया, जबकि परिवार इस योजना से खुश नहीं हैं। सरकार बड़े सपने दिखा रही है, सौगातें नहीं दे रही।”
गोदियाल ने स्पष्ट ऐलान किया—
“कांग्रेस की सरकार बनते ही पहली कैबिनेट में गैरसैंण को स्थायी राजधानी घोषित किया जाएगा।”
गैरसैंण पर कांग्रेस का स्टैंड हुआ और मजबूत
कांग्रेस नेताओं ने कहा कि गैरसैंण सिर्फ प्रशासनिक मुद्दा नहीं,
बल्कि आंदोलनकारियों के बलिदान और उत्तराखंड की अस्मिता से जुड़ा प्रश्न है,
जिस पर अब कोई समझौता नहीं होगा।







