46 वर्षीय एम्बुलेंस चालक के नेत्रदान से दो लोगों की जिंदगी में आएगी रोशनी
पिथौरागढ़: आंखों का दान महादान माना जाता है, क्योंकि मृत्यु के बाद भी किसी की आंखें किसी अंधेरी जिंदगी को रोशन कर सकती हैं। पिथौरागढ़ जिले के बेरीनाग नगर मुख्यालय में रहने वाले 46 वर्षीय पीआरडी जवान जगदीश सिंह डोबाल ने ऐसा ही प्रेरणादायी कार्य कर समाज के सामने एक अनूठी मिसाल पेश की है। जगदीश सिंह ने देह त्याग से पहले अपनी आंखें दान करने का निर्णय लिया और मरणोपरांत नेत्रदान कर उन्होंने मानवता की सेवा का संदेश दिया।
अचानक बिगड़ी तबीयत, देहरादून में कराया गया उपचार
जगदीश सिंह डोबाल बेरीनाग सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में चालक के पद पर तैनात थे। अचानक उनका स्वास्थ्य बिगड़ने पर परिजन उन्हें उपचार के लिए देहरादून के महंत अस्पताल ले गए। यहां इलाज के दौरान उनकी हालत लगातार नाजुक होती गई। इसी दौरान जगदीश ने अपनी आंखें दान करने का दृढ़ संकल्प लिया। उनके इस निर्णय से परिजन भले ही भावुक और हतप्रभ हो गए, लेकिन अंततः उन्होंने उनके इस नेक फैसले का सम्मान किया।
सेवा भाव से जुड़ा था जीवन
साथी कर्मचारियों के अनुसार, जगदीश पहले से ही कहते थे कि मृत्यु से पहले वे अपने शरीर का जो भी हिस्सा काम आ सके, उसे दान करेंगे ताकि किसी जरूरतमंद का जीवन बच सके। वे स्वास्थ्य विभाग में एम्बुलेंस चालक के रूप में कार्यरत थे और मरीजों को अस्पताल ले जाने व लाने का काम करते थे। अस्पताल में आने वाले मरीजों और तीमारदारों की वह हमेशा मदद किया करते थे। उनके मरणोपरांत नेत्रदान की विभिन्न सामाजिक संगठनों ने सराहना की है।
रंगकर्मी और पशु प्रेमी भी थे जगदीश
स्वास्थ्य कर्मी होने के साथ-साथ जगदीश एक संवेदनशील रंगकर्मी और पशु प्रेमी भी थे। उन्होंने बेरीनाग में आयोजित रामलीला में लगातार पांच वर्षों तक सुग्रीव का पात्र निभाया। उन्हें पशु-पक्षियों से गहरा लगाव था और बचपन से ही खरगोश, गिनी पिग, तोता, मुर्गी और कुत्ते जैसे जीवों को पालने का शौक था। उनका सरल स्वभाव और सेवा भाव लोगों के दिलों में हमेशा जीवित रहेगा।
नेत्रदान का महत्व
भारत में लाखों लोग कॉर्निया खराब होने के कारण अंधेपन का शिकार हैं। नेत्रदान के माध्यम से उनकी दृष्टि वापस लाई जा सकती है। एक व्यक्ति की आंखों से दो लोग नई रोशनी पा सकते हैं। नेत्रदान से समाज में सेवा, करुणा और परोपकार की भावना मजबूत होती है और यह इंसान को इंसान के लिए जीना सिखाता है।
नेत्रदान की प्रक्रिया सुरक्षित और सरल
- मौत के 6 घंटे के भीतर आंखें निकाली जाती हैं
- इससे शरीर को कोई नुकसान नहीं होता
- अंतिम संस्कार में कोई बाधा नहीं आती
- नेत्रदान की कोई उम्र सीमा नहीं होती
- बच्चे, युवा, बुजुर्ग सभी नेत्रदान कर सकते हैं
- चश्मा पहनने वाला व्यक्ति भी आंखें दान कर सकता है
पीआरडी जवान जगदीश सिंह डोबाल का यह महान निर्णय न सिर्फ दो लोगों की जिंदगी में रोशनी लाएगा, बल्कि समाज को भी नेत्रदान के प्रति जागरूक करने का काम करेगा। उनका यह महादान आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा प्रेरणा बना रहेगा।







