उत्तरकाशी: बाड़ाहाट कु थोलू के पावन अवसर पर बाड़ाहाट के राजा और क्षेत्र के आराध्य देव कंडार देवता की भव्य हाथी रथयात्रा का आयोजन किया गया। पारंपरिक ढोल-दमाऊ और रणसिंगे की गूंजती धुनों के बीच पांडव पश्वों की अगुवाई में कंडार देवता की यह दिव्य यात्रा पूरे नगर क्षेत्र में निकाली गई, जिसमें सैकड़ों श्रद्धालुओं ने भाग लेकर देवता का आशीर्वाद प्राप्त किया।
हाथी रथयात्रा के दौरान पूरा नगर भक्तिमय माहौल में डूबा नजर आया। यात्रा मार्ग पर स्थानीय लोगों ने देवता की रथयात्रा पर फूलों की वर्षा कर भव्य स्वागत किया। इस दौरान ग्रामीणों और युवाओं ने पारंपरिक रासो तांदी लोकनृत्य प्रस्तुत कर आयोजन को और भी जीवंत बना दिया। ढोल-दमाऊ की थाप पर थिरकते श्रद्धालुओं और जयकारों से पूरा क्षेत्र गूंज उठा।
बाड़ाहाट कु थोलू के दूसरे दिन क्षेत्र के पाटा, संग्राली, बग्याल गांव, लक्षेश्वर समेत आसपास के गांवों के लोग चमाला की चौरी पर एकत्रित हुए। यहां कंडार देवता मंदिर में आराध्य देवता के लिए लकड़ी से निर्मित प्रतिकात्मक हाथी की प्रतिमा तैयार की गई। इसके बाद चमाला की चौरी पर ढोल-दमाऊ और रणसिंगे की थाप के बीच पांडव पश्वों का अवतरण हुआ।
विधि-विधान के साथ कंडार देवता की मूर्ति को हाथी के रथ पर सवार किया गया। इसके पश्चात पांडव पश्वों की अगुवाई में सैकड़ों श्रद्धालुओं के साथ कंडार देवता की भव्य रथयात्रा निकाली गई। यह यात्रा भैरव चौक से शुरू होकर काशी विश्वनाथ चौक, मुख्य बाजार होते हुए मणिकर्णिका घाट पहुंची, जहां मां गंगा की विशेष पूजा-अर्चना की गई। इसके बाद रथयात्रा पुनः चमाला की चौरी पहुंची। इस दौरान विभिन्न स्थानों और चौकों पर स्थानीय महिलाओं और लोगों ने पारंपरिक लोक वेशभूषा में रासो तांदी लोकनृत्य प्रस्तुत किया।
कंडार देवता: राजा, न्याय का देवता और क्षेत्राधिपति
बता दें कि बाड़ाहाट के आराध्य कंडार देवता को बाड़ाहाट का राजा और न्याय का देवता माना जाता है। साथ ही उन्हें उत्तरकाशी का कोतवाल और क्षेत्राधिपति भी कहा जाता है। लोक मान्यता है कि जहां पंडित की पोथी, डॉक्टर की दवा और कोतवाल का डंडा भी काम नहीं आता, वहां कंडार देवता न्याय और समाधान प्रदान करते हैं।
इसी विश्वास के चलते वास्तु दोष, बीमारी, दैवीय प्रकोप समेत विभिन्न समस्याओं के समाधान के लिए श्रद्धालु कंडार देवता के दरबार में पहुंचते हैं। मान्यता है कि देवता में हर प्रकार की विपत्ति के निराकरण का चमत्कारी प्रभाव विद्यमान है। इसके अलावा विवाह, मुंडन, वर-कन्या की जन्म कुंडली मिलान जैसे शुभ कार्य भी कंडार देवता द्वारा बताए गए नियमों और शुभ दिन-वार के अनुसार ही संपन्न किए जाते हैं।
बाड़ाहाट कु थोलू का यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि उत्तरकाशी की समृद्ध लोकसंस्कृति, परंपरा और सामूहिक विश्वास का भी सजीव उदाहरण है।







