उत्तराखंड की आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत की प्रतीक नंदादेवी राजजात यात्रा को लेकर चर्चाएं लगातार तेज होती जा रही हैं। राजा के वंशजों के आदेशों के बाद यह कहा गया है कि यह ऐतिहासिक यात्रा वर्ष 2026 में नहीं, बल्कि 2027 में आयोजित की जाएगी। लेकिन इस घोषणा के साथ ही आस्थावान लोगों के बीच मूल सवाल यही है कि नंदादेवी राजजात यात्रा का निर्णय किसी व्यक्ति, राजा, प्रशासन या व्यवस्था का हो सकता है या फिर यह पूरी तरह माँ नंदा की इच्छा पर निर्भर है।
धार्मिक मान्यताओं और लोक परंपराओं के अनुसार यह स्पष्ट है कि राजा इस यात्रा का स्वामी नहीं, बल्कि केवल एक यात्री है। उसकी भूमिका परंपरागत जरूर है, लेकिन निर्णायक नहीं। कोई भी यात्री—चाहे वह राजा ही क्यों न हो—यह तय नहीं कर सकता कि देवी कब और कैसे यात्रा करेंगी। इतिहास गवाह है कि राजा की अनुपस्थिति में भी नंदादेवी राजजात यात्रा होती रही है।
माँ नंदा की यह यात्रा हर 12 वर्षों में उनके ससुराल (होमकुंड) जाने की परंपरा से जुड़ी है। मान्यता है कि जब माँ को जाना होता है, तो जाना ही होता है। यह किसी प्रशासन, किसी व्यक्ति या किसी व्यवस्था का निर्णय नहीं, बल्कि माँ की इच्छा है। यदि राजा इस यात्रा में शामिल नहीं होता, तो वह उसका निजी निर्णय होगा, और उसका दोष भी वही भोगेगा। लेकिन नंदानगर और बधाण की धरती के लोग यह दोष अपने ऊपर नहीं लेंगे।
नंदाभक्त स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि माँ की इच्छा के विरुद्ध कोई समझौता नहीं किया जाएगा। यदि माँ को 2026 में ही ससुराल जाना है, तो नंदाभक्त 2026 में ही माँ को विदा करेंगे। क्योंकि यह यात्रा किसी सत्ता का आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और श्रद्धा का महापर्व है—और आस्था को टाला नहीं जाता।
नंदादेवी राजजात यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि उत्तराखंड की लोकआस्था, सांस्कृतिक चेतना और सामूहिक विश्वास की जीवंत अभिव्यक्ति है। इसका अंतिम निर्णय सदैव माँ नंदा की इच्छा से जुड़ा माना जाता है, और नंदाभक्त उसी परंपरा और श्रद्धा के साथ इस यात्रा को निभाते आए हैं।







