रामनगर: पहाड़ों की समृद्ध संस्कृति और लोकपरंपरा का जीवंत प्रतीक होली पर्व आज रामनगर में पूरे उत्साह, उमंग और पारंपरिक अंदाज में मनाया गया। ‘छलड़ी’ के साथ कुमाऊंनी होली का विधिवत समापन हुआ। सुबह से ही होल्यारों की टोलियां ढोलक, मंजीरे और हारमोनियम की मधुर धुनों के साथ घर-घर पहुंचीं और लोगों को रंग व अबीर-गुलाल से सराबोर कर दिया।
तीन माह तक चलने वाला सांस्कृतिक उत्सव
कुमाऊं क्षेत्र में होली केवल एक दिन का त्योहार नहीं, बल्कि लगभग तीन महीनों तक चलने वाला सांस्कृतिक उत्सव है। पौष माह के पहले रविवार से इसकी शुरुआत होती है। इसके बाद बैठकी होली, खड़ी होली और महिला होली जैसे विभिन्न चरणों से गुजरते हुए यह पर्व छलड़ी के दिन अपने चरम पर पहुंचता है।
रामनगर के पहाड़ी प्रवासी मोहल्लों में इस परंपरा की खास झलक देखने को मिली। यहां बसे परिवारों ने अपने गांव की विरासत को जीवंत बनाए रखने की अद्भुत मिसाल पेश की।
राग-रंग में डूबे होल्यार
बुजुर्गों से लेकर युवा और बच्चे तक पारंपरिक वेशभूषा में नजर आए। होल्यारों ने शास्त्रीय रागों पर आधारित कुमाऊंनी होली गाकर माहौल को भक्तिमय और रंगीन बना दिया। कहीं भक्ति रस की होली गूंजती रही तो कहीं श्रृंगार रस के गीतों ने लोगों को झूमने पर मजबूर कर दिया।
जगह-जगह लोगों ने होल्यारों की टोलियों का स्वागत किया और एक-दूसरे को रंग लगाकर होली की शुभकामनाएं दीं। पूरे आयोजन में आपसी भाईचारा, प्रेम और सामूहिक सहभागिता साफ झलकती रही।
संस्कृति से जुड़ाव की मिसाल
होल्यारों का कहना है कि यह पर्व केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक पहचान को सहेजने का अवसर भी है। आयोजकों ने बताया कि पिछले तीन महीनों से लगातार होली गायन के कार्यक्रम चल रहे थे और आज छलड़ी के साथ इसका विधिवत समापन किया गया।
रामनगर में मनाई गई यह पारंपरिक होली इस बात का प्रमाण है कि पहाड़ से दूर रहने के बावजूद लोगों का अपनी जड़ों, संस्कृति और विरासत से जुड़ाव आज भी उतना ही मजबूत है।







