देहरादून: उत्तराखंड में हर साल मानसून के दौरान भूस्खलन, भूधंसाव, बादल फटने और अतिवृष्टि जैसी आपदाएं बड़े पैमाने पर तबाही मचाती हैं। आपदा के साथ ही राज्य में विस्थापन और पुनर्वास का मुद्दा फिर से चर्चा में आ जाता है, लेकिन मानसून खत्म होते ही यह बहस अक्सर सरकारी फाइलों तक सिमट कर रह जाती है। जबकि विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों का मानना है कि आपदा प्रभावित और संवेदनशील क्षेत्रों में बसे लोगों के सुरक्षित पुनर्वास पर लगातार और गंभीरता से काम किए जाने की जरूरत है।
उत्तराखंड देश के सबसे आपदा-संवेदनशील राज्यों में शामिल है। यहां हर वर्ष मानसून के दौरान सैकड़ों परिवार प्रभावित होते हैं और कई गांवों में लोगों की जान-माल पर खतरा मंडराने लगता है। ऐसे क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को सुरक्षित स्थानों पर बसाने के लिए विस्थापन और पुनर्वास की प्रक्रिया अपनाई जाती है। हालांकि, वर्षों बाद भी कई परिवार ऐसे हैं जो अभी तक सुरक्षित पुनर्वास का इंतजार कर रहे हैं।
आपदा प्रबंधन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश के 270 गांवों के 3744 परिवारों को विस्थापन की श्रेणी में चिन्हित किया गया है। इनमें से वर्ष 2012 से लेकर 11 फरवरी 2026 तक 236 गांवों के 2904 परिवारों का विस्थापन किया जा चुका है। इस प्रक्रिया पर अब तक 128 करोड़ 98 लाख 32 हजार 817 रुपये खर्च किए जा चुके हैं।
इसके बावजूद राज्य में अभी भी 34 गांवों के 843 परिवार ऐसे हैं जिनका पुनर्वास नहीं हो पाया है। वहीं, आपदाओं के कारण समय-समय पर नए संवेदनशील गांव भी इस सूची में जुड़ते रहे हैं। वर्तमान में 28 नए गांवों के 207 परिवार भी विस्थापन की श्रेणी में शामिल किए गए हैं। इस प्रकार कुल 62 गांवों के 1050 परिवार ऐसे हैं, जिन्हें अभी सुरक्षित स्थानों पर बसाया जाना बाकी है।
आपदा प्रबंधन विभाग के सचिव विनोद कुमार सुमन के अनुसार, राज्य सरकार ने विस्थापन की प्रक्रिया को पहले की तुलना में काफी सरल बनाया है। अब विस्थापन से जुड़े अधिकांश मामलों का निस्तारण जिला स्तर पर गठित समितियों के माध्यम से किया जाता है। केवल वित्तीय स्वीकृति और धनराशि की मांग से जुड़े प्रस्ताव ही शासन स्तर पर भेजे जाते हैं। मांग के अनुसार सरकार द्वारा बजट जारी किया जाता है।
उन्होंने बताया कि राज्य में विस्थापन के लिए स्पष्ट नीति मौजूद है, जिसके तहत प्रभावित परिवार आवेदन करते हैं और जिला स्तर पर स्वीकृति मिलने के बाद पुनर्वास की कार्रवाई शुरू की जाती है। हालांकि, इस प्रक्रिया में सबसे बड़ी चुनौती लोगों का अपने मूल गांव और सामाजिक परिवेश से जुड़ाव है।
सचिव विनोद कुमार सुमन का कहना है कि कई बार लोग अपने गांव और समुदाय को छोड़कर कहीं दूर बसना नहीं चाहते। उनकी सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक रिश्ते और आजीविका का आधार उसी क्षेत्र से जुड़ा होता है। ऐसे में वे चाहते हैं कि यदि पुनर्वास हो तो उनके वर्तमान निवास क्षेत्र के आसपास ही हो। यही कारण है कि कई मामलों में पुनर्वास की प्रक्रिया अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ पाती।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसी आबादी पर खतरा उत्पन्न होने की स्थिति में विभाग पहले सुरक्षात्मक और मिटिगेशन कार्यों को प्राथमिकता देता है। लेकिन यदि इन उपायों के बाद भी खतरा बना रहता है, तब संबंधित क्षेत्र के लोगों को सुरक्षित स्थानों पर बसाने के लिए विस्थापन की कार्रवाई की जाती है।
उत्तराखंड में बढ़ती आपदाओं और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को देखते हुए विशेषज्ञ मानते हैं कि पुनर्वास को केवल आपदा के समय की चर्चा तक सीमित रखने के बजाय इसे दीर्घकालिक योजना और विकास नीति का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। क्योंकि मानसून हर साल आता है, लेकिन सुरक्षित पुनर्वास की प्रतीक्षा कर रहे सैकड़ों परिवारों का इंतजार अब भी खत्म नहीं हुआ है।







