शिकारी पक्षियों पर अध्ययन का दूसरा चरण शुरू, सैटेलाइट टैगिंग से मिल रहे अहम डेटा ।

पहले चरण के रिकॉर्ड सामने आने लगे, रैपटर्स पर मंडराते खतरों का चलेगा पता

देहरादून: शिकारी पक्षियों यानी रैपटर्स पर चल रहे अध्ययन का दूसरा चरण अब शुरू हो चुका है। सबसे अहम बात यह है कि पहले चरण के तहत अध्ययन से जुड़ी टीम को कुछ बेहद जरूरी रिकॉर्ड भी मिलने लगे हैं, जो भविष्य में इन पक्षियों पर मंडरा रहे खतरों को समझने और उन्हें कम करने में महत्वपूर्ण साबित होंगे। दरअसल, दुनिया भर में शिकारी पक्षियों की कई प्रजातियां संकटग्रस्त श्रेणी में रखी गई हैं, जिनमें से कुछ उत्तराखंड में भी मौजूद हैं।

वैश्विक स्तर पर तेजी से घट रही है रैपटर्स की संख्या

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रैपटर्स को लेकर किए गए अध्ययनों में यह सामने आ चुका है कि वैश्विक स्तर पर कई शिकारी पक्षियों की प्रजातियां तेजी से कम हो रही हैं। वर्ष 2004 में पाकिस्तान में किए गए एक अध्ययन में यह खुलासा हुआ था कि मवेशियों के इलाज में इस्तेमाल की जाने वाली कुछ दवाइयां इन शिकारी पक्षियों के लिए घातक साबित हो रही हैं। जब ये पक्षी ऐसे मृत पशुओं को खाते हैं, तो दवाइयों का जहरीला प्रभाव उनकी मौत का कारण बनता है। इसी वजह से दुनिया भर में इनकी संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गई।

WWF-India कर रहा है वैज्ञानिक अध्ययन और निगरानी

वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर इंडिया (WWF-India) भारत में भी इन्हीं परिस्थितियों को समझते हुए रैपटर्स की गतिविधियों और उनके वास स्थलों पर विस्तृत अध्ययन कर रहा है। इसी क्रम में कॉर्बेट टाइगर रिजर्व और राजाजी टाइगर रिजर्व में शिकारी पक्षियों की सैटेलाइट टैगिंग की जा रही है, ताकि उनकी हर गतिविधि पर नजर रखी जा सके और उसी के आधार पर भविष्य की संरक्षण योजनाएं तैयार की जा सकें।

उत्तराखंड में चल रहा है सैटेलाइट टैगिंग का दूसरा चरण

उत्तराखंड में फिलहाल सैटेलाइट टैगिंग का यह दूसरा चरण चल रहा है, जिसके तहत तमाम शिकारी पक्षियों पर टैग लगाए जा रहे हैं। इससे पहले फर्स्ट फेज में 6 शिकारी पक्षियों पर सैटेलाइट टैगिंग की जा चुकी है। अब इन पक्षियों से जुड़े रिकॉर्ड भी अध्ययन करने वाली टीम को मिलने लगे हैं।

इन रिकॉर्ड्स के जरिये यह स्पष्ट हो रहा है कि ये शिकारी पक्षी किन-किन क्षेत्रों में जा रहे हैं, वहां उनके लिए भोजन की क्या उपलब्धता है, उनका रूट चार्ट क्या है और वे किन स्थानों पर अधिक समय बिता रहे हैं। इसी डेटा के आधार पर शिकारी पक्षियों पर मौजूद संभावित खतरों का भी आकलन किया जा रहा है।

दूसरे चरण में 12 पक्षियों पर होगी सैटेलाइट टैगिंग

दूसरे चरण के तहत कॉर्बेट और राजाजी टाइगर रिजर्व में कुल 12 शिकारी पक्षियों पर सैटेलाइट टैगिंग की जाएगी, जिसमें से पहले पक्षी पर टैगिंग का कार्य पूरा हो चुका है। भारत में शिकारी पक्षियों की कुल 105 प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें से 15 प्रजातियां दुनिया भर में संकटग्रस्त श्रेणी में रखी गई हैं।

उत्तराखंड में चल रहे इस अध्ययन के दौरान विशेष रूप से संकटग्रस्त तीन प्रजातियों के गिद्धों पर सैटेलाइट टैगिंग की जा रही है, जिनमें सफेद पूंछ वाला गिद्ध, लाल सिर वाला गिद्ध और मिश्री गिद्ध शामिल हैं।

राजाजी टाइगर रिजर्व निदेशक का बयान

राजाजी टाइगर रिजर्व के निदेशक कोको रोसे बताते हैं कि जिस तरह पूर्व में शिकारी पक्षियों की संख्या में कमी सामने आई थी, उसके बाद इन्हें लेकर बृहद स्तर पर अध्ययन शुरू किया गया है। इस अध्ययन से मिलने वाली रिपोर्ट के आधार पर कर्मचारियों की पेट्रोलिंग से लेकर शिकारी पक्षियों के वास स्थलों को सुरक्षित बनाने तक के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे।

उन्होंने बताया कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह बात सामने आई थी कि दुनिया के कई क्षेत्रों में कुछ ऐसी दवाइयों का उपयोग हो रहा है, जो पशुओं की बीमारियों के इलाज में तो प्रयोग की जा रही हैं, लेकिन जब शिकारी पक्षी इन दवाइयों के असर से मरे हुए पशुओं को खाते हैं, तो इसका सीधा असर इन पक्षियों पर पड़ता है और उनकी मौत हो जाती है।

पारिस्थितिकी तंत्र में रैपटर्स की अहम भूमिका

शिकारी पक्षी केवल सड़े हुए शवों को खाकर संक्रामक रोगों की संभावनाओं को ही कम नहीं करते, बल्कि कीट-पतंगों को खाकर उनकी संख्या को भी नियंत्रित करते हैं। इस लिहाज से रैपटर्स का पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन बनाए रखने में बेहद महत्वपूर्ण योगदान है।

संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण पहल

विशेषज्ञों का मानना है कि सैटेलाइट टैगिंग और वैज्ञानिक अध्ययन के माध्यम से मिलने वाला यह डेटा उत्तराखंड समेत पूरे देश में शिकारी पक्षियों के संरक्षण के लिए बेहद उपयोगी साबित होगा। इससे न केवल इन दुर्लभ पक्षियों की निगरानी संभव होगी, बल्कि उनके लिए सुरक्षित वासस्थल, भोजन व्यवस्था और संरक्षण की ठोस रणनीति भी तैयार की जा सकेगी।

यदि समय रहते प्रभावी कदम उठाए गए, तो इन महत्वपूर्ण शिकारी पक्षियों को विलुप्त होने से बचाया जा सकता है।

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