उत्तराखंड में मादक पदार्थों के खिलाफ लड़ाई को और प्रभावी बनाने की दिशा में सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। देहरादून सचिवालय में हुई उच्चस्तरीय बैठक में स्पष्ट संकेत दिए गए कि अब कार्रवाई केवल छोटे तस्करों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि ड्रग्स के पूरे सप्लाई नेटवर्क को तोड़ने पर फोकस किया जाएगा। इसके साथ ही समाज स्तर पर रोकथाम, इलाज और पुनर्वास को भी रणनीति का अहम हिस्सा बनाया जाएगा।
जिला स्तर पर बनेगी अलग रणनीति
बैठक में यह बात सामने आई कि राज्य के अलग-अलग जिलों में ड्रग्स की समस्या अलग रूप में मौजूद है। इसी को ध्यान में रखते हुए राज्य और जनपद स्तर पर अलग-अलग रणनीति तैयार करने का निर्णय लिया गया है। अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि अगले 15 दिनों के भीतर एक साल का विस्तृत एक्शन प्लान तैयार किया जाए।
कानूनी कार्रवाई के साथ इलाज और पुनर्वास पर जोर
सरकार ने साफ किया है कि नशे की समस्या को केवल कानून व्यवस्था के नजरिए से नहीं देखा जाएगा। नशा छोड़ चुके लोगों के इलाज और पुनर्वास को भी प्राथमिकता दी जाएगी, ताकि वे दोबारा इस जाल में न फंसें।
धीमी न्यायिक प्रक्रिया बनी चुनौती
बैठक में ड्रग्स से जुड़े मामलों में धीमी न्यायिक प्रक्रिया और कमजोर फॉलोअप को बड़ी चुनौती माना गया। खासकर बड़ी मात्रा में पकड़े गए मादक पदार्थों के मामलों में सख्त और निरंतर कार्रवाई पर जोर दिया गया, ताकि बड़े नेटवर्क तक पहुंच बनाई जा सके।
छोटे तस्करों नहीं, बड़े नेटवर्क पर फोकस
पुलिस और एजेंसियों को निर्देश दिए गए कि अब कार्रवाई का दायरा बढ़ाना होगा। केवल छोटे स्तर के तस्करों को पकड़ने के बजाय उन कड़ियों तक पहुंचना जरूरी है, जो पूरे सप्लाई चेन को संचालित करती हैं। माना गया कि जब तक नेटवर्क नहीं टूटेगा, तब तक जमीनी स्तर पर नशे की उपलब्धता कम नहीं होगी।
स्कूल-कॉलेज में एंटी-ड्रग अभियान
युवाओं और स्कूली बच्चों में बढ़ते नशे के प्रभाव को देखते हुए स्कूलों और कॉलेजों में एंटी-ड्रग क्लब बनाने और नियमित जागरूकता कार्यक्रम चलाने का निर्णय लिया गया है।
इसके अलावा शिक्षण संस्थानों के 100 मीटर के दायरे में गुटखा, तंबाकू और अन्य नशीले पदार्थों की बिक्री पर सख्ती बढ़ाने की योजना भी बनाई गई है।
राज्यव्यापी सर्वे की तैयारी
ड्रग्स के फैलाव की वास्तविक स्थिति जानने के लिए राज्य स्तर पर सर्वे कराने का प्रस्ताव रखा गया है। इससे यह पता चल सकेगा कि किन क्षेत्रों और वर्गों में समस्या अधिक गंभीर है, जिससे लक्षित कार्रवाई करना आसान होगा।
डी-एडिक्शन सेंटरों पर सख्ती
निजी नशामुक्ति केंद्रों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठे हैं। बैठक में तय किया गया कि इन केंद्रों का नियमित निरीक्षण किया जाएगा और जो निर्धारित मानकों पर खरे नहीं उतरेंगे, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
साथ ही सरकारी अस्पतालों में नशामुक्ति सेवाओं को मजबूत करने के लिए हर जिले में कम से कम एक अस्पताल में डी-एडिक्शन बेड आरक्षित करने की योजना पर काम शुरू किया जा रहा है।
निगरानी तंत्र होगा मजबूत
गढ़वाल और कुमाऊं मंडल में अलग-अलग ड्रग इंस्पेक्टर तैनात करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया है, ताकि जमीनी स्तर पर निगरानी और कार्रवाई की गुणवत्ता में सुधार लाया जा सके।
निष्कर्ष:
उत्तराखंड सरकार अब ड्रग्स के खिलाफ व्यापक और बहु-स्तरीय रणनीति के साथ आगे बढ़ रही है। कानून, स्वास्थ्य और समाज—तीनों स्तरों पर एक साथ कार्रवाई करके नशे के बढ़ते खतरे पर प्रभावी नियंत्रण पाने की कोशिश की जा रही है।







