देहरादून: उत्तराखंड में ग्लेशियल झीलों से होने वाली संभावित ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) के जोखिम को कम करने और उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियर झीलों की निगरानी मजबूत करने की दिशा में पहल शुरू हो गई है। चमोली जिले के वसुंधरा ताल से प्रदेश में ग्लेशियल झीलों के लिए अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने की शुरुआत की जा रही है।
मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन ने मंगलवार को सचिवालय से वसुंधरा ताल में निगरानी और पूर्व चेतावनी प्रणाली स्थापित करने के लिए रवाना होने वाले वैज्ञानिक एवं तकनीकी दल को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया।
SDRF, NDRF और ITBP भी अभियान दल के साथ
उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (USDMA) की ओर से राष्ट्रीय ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम के तहत यह अभियान संचालित किया जा रहा है। अभियान दल में केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (CBRI), रुड़की के 12 सदस्य और वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान, देहरादून के 2 वैज्ञानिक शामिल हैं।
उच्च हिमालयी और दुर्गम क्षेत्र में अभियान दल की सुरक्षा, आवागमन और फील्ड सहयोग के लिए SDRF, NDRF और ITBP के जवान भी टीम के साथ रहेंगे। USDMA की ओर से अभियान के लिए आवश्यक समन्वय और लॉजिस्टिक सहायता उपलब्ध कराई गई है।
टीम को सैटेलाइट फोन के साथ लो अर्थ ऑर्बिट डिवाइस भी उपलब्ध कराई गई है, जिससे दुर्गम क्षेत्र में संचार और समन्वय बना रहेगा।
वसुंधरा ताल पर रियल टाइम मॉनिटरिंग
प्रस्तावित सिस्टम के जरिए वसुंधरा ताल और उसके आसपास के पर्यावरणीय एवं जलवैज्ञानिक बदलावों की लगातार निगरानी की जाएगी। सेंसरों से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर संभावित असामान्य बदलावों की पहचान की जा सकेगी और समय रहते संबंधित तंत्र को अलर्ट उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी।
वसुंधरा ताल पर अलग-अलग प्रकार के सेंसर और उपकरण लगाए जाएंगे, जिनमें जलस्तर सेंसर, स्वचालित मौसम केंद्र, स्नो डेप्थ सेंसर, स्नो सब-सर्फेस टेंपरेचर सेंसर, टिल्ट एवं एक्सेलेरोमीटर सेंसर, जल प्रवाह सेंसर, सौर ऊर्जा प्रणाली, उपग्रह संचार प्रणाली तथा डेटा लॉगर एवं मॉनिटरिंग डैशबोर्ड शामिल हैं।
इन उपकरणों से झील के जलस्तर, तापमान, बर्फ की गहराई, वर्षा, हवा की गति और दिशा, वायुदाब, जल प्रवाह, कंपन और भू-भाग में होने वाली हलचल जैसे महत्वपूर्ण बदलावों की निगरानी की जाएगी।
-40 से +50 डिग्री सेल्सियस तक काम करेगा सिस्टम
CBRI रुड़की के निदेशक प्रो. प्रदीप कुमार रमनचारला ने बताया कि टीम जिन उपकरणों को स्थापित करने जा रही है, उनके जरिए ग्लेशियल झील के वाटर लेवल, स्नो डेप्थ और स्नो कोर समेत विभिन्न महत्वपूर्ण मानकों की निगरानी की जाएगी। इसके जरिए देहरादून में बनाए जाने वाले डेटा सेंटर तक जानकारी पहुंचती रहेगी और रियल टाइम मॉनिटरिंग संभव होगी।
उन्होंने बताया कि वसुंधरा ताल के समीप करीब आठ तरह के सेंसर लगाए जाएंगे और सैटेलाइट कम्युनिकेशन के जरिए इनसे प्राप्त जानकारी उपलब्ध होगी। ये उपकरण CBRI रुड़की की ओर से तैयार किए गए हैं।
रमनचारला के मुताबिक करीब छह महीने पहले डुंडी स्टेशन पर इन उपकरणों का ट्रायल किया जा चुका है, जहां बेहतर रिस्पांस मिला था। अब वसुंधरा ताल में भी इन उपकरणों का ट्रायल किया जा रहा है। अगले छह महीने में प्राप्त जानकारी के आधार पर इसके विस्तार पर विचार किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि यह सिस्टम माइनस 40 से प्लस 50 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में भी काम करने में सक्षम होगा।
उत्तराखंड में 344 ग्लेशियल झीलें चिन्हित
मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन ने कहा कि वसुंधरा ताल में सेंसर और उपकरण स्थापित करने के लिए टीम रवाना हो गई है। ये उपकरण विभिन्न मानकों की माप के साथ कंट्रोल रूम तक जानकारी उपलब्ध कराएंगे। फिलहाल यह काम ट्रायल बेस पर किया जा रहा है।
उन्होंने बताया कि राज्य सरकार ग्लेशियल झीलों की स्थिति और संभावित GLOF जोखिम को लेकर लगातार निगरानी और वैज्ञानिक अध्ययन कर रही है। राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (NRSC) के साल 2023 के आंकड़ों के अनुसार उत्तराखंड में कुल 344 ग्लेशियल झीलें चिह्नित की गई हैं।
वहीं, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने इनमें से 13 ग्लेशियल झीलों को उच्च जोखिम वाली झीलों के रूप में चिन्हित किया है। इनमें बागेश्वर की 1, चमोली की 4, पिथौरागढ़ की 6, टिहरी गढ़वाल की 1 और उत्तरकाशी की 1 झील शामिल है।
छह ग्लेशियल झीलों का बाथीमेट्रिक सर्वे पूरा
आपदा प्रबंधन सचिव विनोद कुमार सुमन ने बताया कि उच्च जोखिम वाली ग्लेशियल झीलों की वैज्ञानिक और तकनीकी जांच के तहत अब तक छह झीलों का बाथीमेट्रिक सर्वेक्षण पूरा किया जा चुका है।
इनमें चमोली जिले की सरस्वती ताल और वसुंधरा ताल, उत्तरकाशी जिले की केदारताल तथा पिथौरागढ़ जिले की दारमा घाटी स्थित मबांग, प्यूनग्रू और स्युंक्ति यांक्ति प्रोग्लेशियल झीलें शामिल हैं।
बाथीमेट्रिक सर्वेक्षण के जरिए इन झीलों की गहराई, जलधारण क्षमता और अन्य महत्वपूर्ण जलवैज्ञानिक आंकड़े जुटाए गए हैं। इन आंकड़ों के आधार पर संभावित GLOF जोखिम का वैज्ञानिक आकलन करने और आपदा प्रबंधन की तैयारियों को और मजबूत करने में मदद मिलेगी।
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