12 वर्षों में आयोजित होने वाला ऐतिहासिक मौरी मेला शुरू, छह माह तक पांडव लीला और धार्मिक अनुष्ठानों की रहेगी धूम ।

जिला मुख्यालय पौड़ी से सटी गगवाड़स्यूं घाटी का प्रसिद्ध मौरी मेला इस बार एक बार फिर अपनी पारंपरिक आभा के साथ शुरू हो गया है। कुंभ और नंदा देवी राजजात की तरह हर 12 वर्ष में आयोजित होने वाला यह मेला धार्मिक आस्था, लोककथाओं और सांस्कृतिक विरासत का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है।

विकासखंड पौड़ी के तमलाग और कुंडी गांवों में रहने वाले ग्रामीण परंपरागत रूप से पांडवों को देवताओं के रूप में पूजते हैं। इसी आस्था के आधार पर तमलाग गांव में मौरी मेले की शुरुआत की गई है। यह मेला लगातार छह से सात महीने तक चलेगा, जिसमें दूर-दराज में रहने वाले प्रवासी ग्रामीण बड़ी संख्या में शामिल होकर अपनी परंपराओं से जुड़ेंगे।

ढोल सागर के साथ पांडव अवतरण, पांडव नृत्य और धार्मिक आयोजन प्रमुख आकर्षण

मेले की सबसे खास बात है दैनिक पांडव अवतरण, जिसमें ढोल-दमाऊं और ढोल सागर की धुनों पर माता कुंती, द्रौपदी और पाँचों पांडव ग्रामीणों पर पश्वा के रूप में अवतरित होते हैं।

मेले के दौरान—

  • भैरव मंदिर के चौक में प्रतिदिन पांडव अवतरण
  • पांडव नृत्य (पांडव लीला)
  • गणेश पूजन
  • देवप्रयाग तक पैदल यात्रा
  • गेंडी वध और दो पेड़ गांव लाया जाना
  • अन्य पारंपरिक अनुष्ठान

इन सभी कार्यक्रमों का विधि-विधान से आयोजन छह महीने तक लगातार किया जाएगा।

प्रवासी ग्रामीणों की बड़ी भागीदारी, बेटियों (ध्याणियों) को भेजा जाएगा विशेष न्योता

ग्रामीणों का कहना है कि यह मेला सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि समुदाय को जोड़ने वाला बड़ा उत्सव है। खास बात यह है कि तमलाग और कुंडी गांव से दूर बसे प्रवासी परिवार भी हर बार इस आयोजन में लौटकर आते हैं और तैयारी में पूरा सहयोग देते हैं।

मेले में उन ध्याणियों (बेटियों) को भी विशेष निमंत्रण भेजा जाता है जिनका विवाह गांव से बाहर हो चुका है, ताकि वे अपनी अगली पीढ़ी को इस परंपरा से जोड़ सकें और मेले की धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्ता का अनुभव करा सकें।

पलायन के बीच परंपराओं को संजोने का बड़ा माध्यम

ग्रामीण बताते हैं कि पहाड़ों में लगातार हो रहे पलायन के बीच यह मेला लोगों को अपनी जड़ों से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है। 12 साल बाद आयोजित हो रहे मेले में दूर-दूर से लोग अपने बच्चों के साथ गांव पहुँच रहे हैं, जिससे नई पीढ़ी का अपने गांव, संस्कृति और विरासत से लगाव बढ़ रहा है।

लोककथाओं से जुड़ी मौरी मेले की उत्पत्ति: दान से समृद्धि की परंपरा

मौरी मेले की गाथा पांडवों के वनवास काल से जुड़ी मानी जाती है।

कहा जाता है कि पांडव तमलाग और सबदरखाल के पास स्थित कुंडी गांव में कुछ समय रुके थे। ग्रामीणों के सत्कार से प्रसन्न होकर माता कुंती ने तमलाग को अपना ससुराल और कुंडी को मायका कहा।

एक अन्य लोककथा के अनुसार—

  • रूपैणा, पांडवों की धर्म बहन, का विवाह राजा नारायण से हुआ था।
  • एक दिन नारायण कुसमा कुवेण नामक सुंदरी के रूप पर मोहित होकर अपना राज्य और परिवार भूल जाते हैं।
  • उपद्रवी दानव उनके राज्य पर हमला कर देते हैं और रूपैणा के पुत्रों की हत्या कर देते हैं।
  • संकट में पड़ी रूपैणा ने जब माता कुंती से अपनी व्यथा बताई, तो कुंती ने उनका राज्य वापस दिलाने का वचन दिया।
  • पांडवों ने युद्ध कर धर्म बहन को उसका राज्य वापस लौटाया।

इसी दान और समृद्धि (मौरी) की भावना से यह मेला शुरू हुआ और तब से हर 12 वर्ष में इस परंपरा को निभाया जा रहा है।

अगले वर्ष जुलाई तक चलेगा मेला

मेला आयोजक समिति के अनुसार यह आयोजन इस वर्ष दिसंबर से शुरू होकर अगले वर्ष जुलाई तक चलेगा। सात महीनों तक गांवों में पांडव लीला और पारंपरिक कार्यक्रमों का भव्य आयोजन होते रहेंगे।

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