विकासनगर: देवभूमि उत्तराखंड अपनी समृद्ध धार्मिक परंपराओं, लोक आस्थाओं और प्राचीन संस्कृति के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। चारधाम, पवित्र नदियों, ऊंचे पर्वतों और देवस्थलों की इस भूमि में पर्व-त्योहारों का भी विशेष महत्व है। इसी कड़ी में देहरादून जिले के जौनसार-बावर क्षेत्र में मनाया जाने वाला महासू देवता का जागड़ा पर्व एक बार फिर श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ संपन्न हुआ।
भाद्रपद माह में 13 और 14 सितंबर को मनाए जाने वाले इस पारंपरिक पर्व के अवसर पर रविवार रात मुख्य महासू मंदिर हनोल और थैना गांव स्थित द्वितीय सिद्धपीठ महासू मंदिर में भव्य रात्रि जागरण का आयोजन किया गया। सोमवार को थैना गांव स्थित महासू मंदिर में श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा। बच्चे, महिलाएं, युवा और बुजुर्ग बड़ी संख्या में अपने इष्ट देव महासू महाराज के दर्शन के लिए मंदिर पहुंचे।
महासू देवता की डोली के दर्शन को उमड़ी भीड़
पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार महासू देवता की डोली को मंदिर से बाहर निकाला गया। ढोल-दमाऊं और अन्य वाद्य यंत्रों की गूंज के बीच पूरे क्षेत्र में महासू देवता के जयकारे सुनाई दिए। वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो गया।
डोली को पहले देवता के पवित्र जल स्रोत पर स्नान कराया गया और इसके बाद श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ मंदिर परिसर में लाया गया। परिसर में उपस्थित श्रद्धालुओं ने महासू महाराज के जयकारों से माहौल को और भी श्रद्धामय बना दिया। गांव की महिलाओं ने हाथों में धूप लेकर पालकी की अक्षत और घी से पूजा-अर्चना की।
देवधुन में झूमे श्रद्धालु, कुछ पर अवतरित हुए देवता
महासू देवता की पालकी को कंधा देने के लिए श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखने को मिला। मंदिर परिसर में हर ओर “महासू महाराज की जय” के उद्घोष गूंजते रहे। इस दौरान देवधुन के बीच कुछ महिलाओं और पुरुषों पर देवता अवतरित होने की लोक परंपरा भी देखने को मिली, जिसे श्रद्धालुओं ने गहरी आस्था के साथ देखा।
इसके बाद देव डोली को मंदिर परिसर के मध्य देवदार की लकड़ी से बने विशेष आसन पर विराजमान किया गया और श्रद्धालुओं को दर्शन कराने के उपरांत विधिवत मंदिर में स्थापित किया गया।
थैना महासू मंदिर से जुड़ी है अनोखी मान्यता
थैना मंदिर समिति के अध्यक्ष संजय भट्ट ने बताया कि हनोल धाम की तरह ही थैना महासू मंदिर का भी विशेष महत्व है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार राजा सामूसाहू के अत्याचारों से परेशान लोगों ने हनोल धाम जाकर महासू महाराज से न्याय की गुहार लगाई थी। तब महाराज ने स्वयं उस क्षेत्र में विराजमान होने का आश्वासन दिया।
लोककथाओं के अनुसार जब महासू देवता की मूर्ति कंडी में रखकर विभिन्न स्थानों पर ले जाई जा रही थी, तब थैना गांव पहुंचने पर कंडी आगे नहीं उठ सकी। इसे देव संकेत माना गया और यहीं महासू महाराज के निवास का निर्णय हुआ।
चींटियों ने बनाया मंदिर का वास्तु, ऐसी है लोककथा
थैना महासू मंदिर से जुड़ी एक और रोचक लोकमान्यता भी प्रचलित है। बुजुर्गों के अनुसार मंदिर के निर्माण से पहले यह प्रश्न उठा कि इसका वास्तु कैसा होगा। मान्यता है कि अगले दिन चींटियों ने जमीन पर मंदिर की आकृति बनाकर वास्तु का संकेत दिया। इसी आधार पर मंदिर का स्वरूप निर्धारित किया गया।
कहा जाता है कि महासू महाराज ने यह भी संकेत दिया था कि यहां फूल खिलेंगे, जल स्रोत फूटेगा और बकरी बघेरे को परास्त करेगी। स्थानीय लोकविश्वास के अनुसार यह सभी घटनाएं घटित हुईं, जिसके बाद यहां महासू महाराज का स्थायी निवास स्थापित हुआ।
श्रद्धालुओं की हर मनोकामना पूरी होने की मान्यता
स्थानीय लोगों का विश्वास है कि जो भी श्रद्धालु सच्चे मन से महासू देवता के दरबार में हाजिरी लगाता है, उसकी मनोकामना अवश्य पूरी होती है। इसी आस्था के चलते हर वर्ष जागड़ा पर्व पर दूर-दराज क्षेत्रों से हजारों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।
स्थानीय महिला सुनीता रोहिल्ला ने बताया कि महासू महाराज का जागड़ा पर्व क्षेत्र का सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक आयोजन है। जागरण और देव डोली की परंपरा सदियों से चली आ रही है, जिसे आज भी पूरी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ निभाया जाता है।
जौनसार-बावर की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत का प्रतीक महासू देवता का जागड़ा पर्व एक बार फिर श्रद्धा, आस्था और लोकपरंपराओं के अनूठे संगम का साक्षी बना।







