देहरादून: उत्तराखंड को देश में ऑर्गेनिक खेती के मॉडल राज्य के रूप में स्थापित करने की दिशा में वर्षों से किए जा रहे प्रयास अब बड़े संकट में घिरते नजर आ रहे हैं। प्रदेश में जैविक खेती से जुड़े 90 हजार से अधिक किसानों के ऑर्गेनिक सर्टिफिकेट सस्पेंड होने से न केवल किसानों की आजीविका पर खतरा मंडरा रहा है, बल्कि राज्य की ऑर्गेनिक पहचान पर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
उत्तराखंड स्टेट ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन एजेंसी (यूएसओसीए) द्वारा की गई इस कार्रवाई ने विभागीय कार्यप्रणाली और सरकारी तैयारियों को कटघरे में ला खड़ा किया है।
74 हजार हेक्टेयर भूमि पर हो रही जैविक खेती
प्रदेश में वर्तमान में करीब डेढ़ लाख किसान जैविक खेती से जुड़े हुए हैं, जो लगभग 74 हजार हेक्टेयर भूमि पर ऑर्गेनिक खेती कर रहे हैं। पिछले दो दशकों में किसानों को रासायनिक खेती से हटाकर जैविक खेती की ओर प्रोत्साहित करने के लिए सरकार ने बड़े स्तर पर अभियान चलाए थे।
किसानों को प्रशिक्षण, उत्पादों के प्रमाणीकरण और बाजार उपलब्ध कराने जैसी योजनाओं पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए। लेकिन अब सरकारी सिस्टम की धीमी कार्यप्रणाली और विभागीय समन्वय की कमी ने पूरी व्यवस्था को संकट में डाल दिया है।
कानूनी इकाई का दर्जा न होने से कार्रवाई
जानकारी के मुताबिक प्रदेश के 312 ऑर्गेनिक ग्रोवर ग्रुप से जुड़े किसानों का प्रमाणीकरण इसलिए निलंबित किया गया क्योंकि इन समूहों के पास वैध “लीगल एंटिटी” यानी कानूनी इकाई का दर्जा नहीं था।
नियमों के अनुसार ऑर्गेनिक खेती से जुड़े समूहों का सोसाइटी, कंपनी या अन्य कानूनी संस्था के रूप में पंजीकृत होना अनिवार्य है। लेकिन बड़ी संख्या में समूह अब तक रजिस्टर्ड नहीं हो सके।
बताया जा रहा है कि एपीडा ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए 16 अप्रैल 2026 को कृषि सचिव एसएन पांडे को पत्र लिखकर स्थिति से अवगत कराया था। इसके बावजूद विभागीय स्तर पर समय रहते ठोस पहल नहीं की गई।
अब स्थिति यह है कि 90 हजार से अधिक किसानों के सर्टिफिकेट सस्पेंड हो चुके हैं और यदि जल्द समाधान नहीं निकला तो जून के अंत तक 1 लाख 13 हजार से अधिक किसानों के प्रमाणीकरण पर संकट गहरा सकता है।
एपीडा ने जताई चिंता, अतिरिक्त समय देने को तैयार
मामले की गंभीरता को देखते हुए एपीडा ने भी चिंता जताई है। प्राधिकरण का मानना है कि उत्तराखंड देश के उन चुनिंदा राज्यों में शामिल है, जहां ऑर्गेनिक खेती को बड़े स्तर पर बढ़ावा मिला है। ऐसे में इतने बड़े पैमाने पर प्रमाणीकरण निलंबित होना किसानों और राज्य दोनों के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है।
एपीडा ने राज्य सरकार से अनुरोध किया है कि उत्तराखंड ऑर्गेनिक कमोडिटी बोर्ड (यूओसीबी) और यूएसओसीए को आवश्यक निर्देश जारी किए जाएं ताकि किसानों के प्रमाणन का नवीनीकरण जल्द किया जा सके।
हालांकि राहत की बात यह है कि प्राधिकरण ने किसानों को कानूनी औपचारिकताएं पूरी करने के लिए अतिरिक्त समय देने पर सहमति जताई है।
चार महीने से वेतन नहीं, कर्मचारी हड़ताल पर
इस पूरे विवाद के बीच उत्तराखंड जैविक उत्पाद परिषद के कर्मचारी भी हड़ताल पर चले गए हैं। कर्मचारियों का आरोप है कि उन्हें पिछले चार महीनों से वेतन नहीं मिला है, जिससे आर्थिक संकट खड़ा हो गया है।
परिषद के फील्ड और कार्यालय कर्मचारियों ने कामकाज ठप कर धरना शुरू कर दिया है। कर्मचारी संगठन का कहना है कि अधिकारियों की लापरवाही और योजनाओं के संचालन में रुचि न लेने के कारण हालात बिगड़े हैं, जिसका खामियाजा अब किसानों और कर्मचारियों दोनों को भुगतना पड़ रहा है।
प्रबंधन ने कर्मचारियों को ठहराया जिम्मेदार
वहीं दूसरी ओर यूओसीबी प्रबंधन ने पूरे मामले के लिए कर्मचारियों को जिम्मेदार ठहराया है।
अभय सक्सेना का कहना है कि किसान समूहों को आत्मनिर्भर बनाना और उन्हें कानूनी इकाई का दर्जा दिलाना कर्मचारियों की जिम्मेदारी थी। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार पहले भी इस संबंध में दिशा-निर्देश जारी कर चुकी थी।
एमडी के अनुसार एपीडा सस्पेंड अवधि को भी निरंतरता में जोड़ने पर सहमत हो गया है, जिससे किसानों को राहत मिल सकती है। उन्होंने दावा किया कि करीब 90 लाख रुपये का बजट स्वीकृत हो चुका है और अगले 10 से 12 दिनों में कर्मचारियों का लंबित भुगतान जारी कर दिया जाएगा।
फिलहाल इस पूरे मामले ने राज्य की ऑर्गेनिक खेती नीति और प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।







