देहरादून: सड़क पर नमाज को लेकर सियासत तेज, मुस्लिम संगठनों ने भी कहा- इबादत से आम जनता को नहीं होनी चाहिए परेशानी

देहरादून: उत्तराखंड में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के सड़क पर नमाज पढ़ने को लेकर दिए गए बयान के बाद प्रदेश में राजनीतिक और सामाजिक चर्चाएं तेज हो गई हैं। जहां विभिन्न राजनीतिक दल इस मुद्दे पर अपनी-अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं, वहीं अब मुस्लिम समुदाय और उससे जुड़े संगठनों की राय भी खुलकर सामने आने लगी है।

मुख्यमंत्री धामी ने हाल ही में सार्वजनिक स्थानों और सड़कों पर नमाज पढ़े जाने को लेकर कहा था कि किसी भी धार्मिक गतिविधि की वजह से आम जनता को परेशानी नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा था कि सड़कें आम लोगों के आवागमन के लिए होती हैं और वहां यातायात बाधित होने से कई तरह की दिक्कतें सामने आती हैं।

सीएम के इस बयान के बाद प्रदेश में बहस तेज हो गई थी। हालांकि अब कई मुस्लिम नेताओं ने भी सड़क पर नमाज को उचित नहीं बताते हुए मस्जिदों और ईदगाहों के भीतर ही नमाज अदा करने की बात कही है। उनका कहना है कि धार्मिक आस्था के साथ-साथ सामाजिक जिम्मेदारी और आम लोगों की सुविधा का भी ध्यान रखना जरूरी है।

वक्फ बोर्ड अध्यक्ष ने किया बयान का समर्थन

उत्तराखंड वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष शादाब शम्स ने मुख्यमंत्री धामी के बयान का समर्थन करते हुए कहा कि इस मुद्दे को केवल राजनीति के नजरिए से नहीं बल्कि धार्मिक और सामाजिक दृष्टिकोण से भी समझने की जरूरत है।

उन्होंने कहा कि इस्लाम में इबादत के कुछ नियम और आदाब बताए गए हैं, जिन्हें “हक उल इबाद” कहा जाता है। इसका अर्थ है कि किसी की इबादत से दूसरे लोगों को परेशानी नहीं होनी चाहिए।

शादाब शम्स ने कहा कि ईद और जुम्मे की नमाज के दौरान कई बार मस्जिदों और ईदगाहों में भीड़ अधिक हो जाती है, जिसके कारण कुछ लोग सड़कों पर नमाज अदा करने लगते हैं। लेकिन इससे आम जनता को दिक्कत होती है, सड़कें जाम हो जाती हैं और कई बार एंबुलेंस तक फंस जाती हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि सड़क इबादत के लिए उपयुक्त स्थान नहीं है, क्योंकि वहां धूल, मिट्टी और वाहनों की आवाजाही रहती है। इस्लाम साफ-सफाई और अनुशासन पर जोर देता है।

जरूरत पड़ने पर दो पालियों में हो सकती है नमाज

शादाब शम्स ने कहा कि इस मामले में टकराव की कोई जरूरत नहीं है। आवश्यकता पड़ने पर नमाज दो अलग-अलग पालियों में भी पढ़ी जा सकती है। उन्होंने बताया कि उलेमाओं की ओर से पहले भी इस संबंध में फतवा जारी किया जा चुका है कि ईद की नमाज दो बार में अदा की जा सकती है ताकि भीड़ और अव्यवस्था से बचा जा सके।

जमीअत उलेमा ए हिंद ने भी दी प्रतिक्रिया

वहीं जमीअत उलेमा ए हिंद के उत्तराखंड प्रदेश मीडिया प्रभारी मोहम्मद शाह नजर ने भी कहा कि उनका संगठन पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि नमाज केवल मस्जिदों और ईदगाहों के अंदर ही पढ़ी जानी चाहिए।

उन्होंने कहा कि पूरे उत्तराखंड में केवल एक-दो स्थान ऐसे हैं, जहां जगह की कमी की स्थिति सामने आती है। लेकिन वहां भी बेहतर व्यवस्था बनाए रखने की कोशिश की जाएगी।

मोहम्मद शाह नजर ने कहा कि जरूरत पड़ने पर नमाज दो पालियों में भी पढ़ी जा सकती है, ताकि किसी प्रकार की ट्रैफिक समस्या या अव्यवस्था उत्पन्न न हो। उन्होंने कहा कि इस्लाम अमन, अनुशासन और दूसरों की सुविधा का संदेश देता है।

बकरीद को लेकर मुस्लिम समाज से अपील

आगामी ईद-उल-अजहा को लेकर जमीयत उलेमा जिला देहरादून ने मुस्लिम समाज से कानून व्यवस्था, साफ-सफाई और सामाजिक सौहार्द बनाए रखने की अपील की है।

देहरादून की आजाद कॉलोनी स्थित मदरसा दार-ए-अरकम में आयोजित बैठक के बाद संस्था ने कहा कि कुर्बानी केवल निर्धारित और वैध स्थानों पर ही की जाए। सड़क, गली, चौराहे और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर कुर्बानी से बचा जाए, ताकि आम लोगों को परेशानी न हो।

संस्था ने यह भी अपील की कि कुर्बानी की फोटो और वीडियो सोशल मीडिया पर साझा न किए जाएं, क्योंकि इससे कई बार समाज में गलत संदेश जाता है और विवाद की स्थिति पैदा हो सकती है।

गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मुहिम

बैठक में यह भी निर्णय लिया गया कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किए जाने की मांग को लेकर उत्तराखंड में भी जागरूकता अभियान चलाया जाएगा।

जमीयत उलेमा ने लोगों से अफवाहों और भड़काऊ बातों से दूर रहने की अपील करते हुए कहा कि समाज में शांति, सौहार्द और आपसी सम्मान बनाए रखना सभी नागरिकों की साझा जिम्मेदारी है।

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