रुद्रप्रयाग: केदारनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग को जोड़ने वाले रुद्रप्रयाग-जवाड़ी बाईपास स्थित विश्वप्रसिद्ध संगम व्यू प्वाइंट अपनी अद्भुत प्राकृतिक सुंदरता और अलकनंदा-मंदाकिनी संगम के दिव्य दृश्य के कारण लाखों श्रद्धालुओं एवं पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। प्रतिदिन यहां बड़ी संख्या में पर्यटक और यात्री पहुंचकर घाटियों और संगम के मनोरम दृश्यों का आनंद लेते हैं। लेकिन पर्यटन मानचित्र पर तेजी से उभर रहे इस महत्वपूर्ण स्थल की वर्तमान स्थिति गंभीर चिंता का विषय बनती जा रही है।
व्यू प्वाइंट पर फैली गंदगी, प्लास्टिक कचरे के ढेर और बुनियादी सुविधाओं की कमी न केवल इस पर्यटन स्थल की छवि को धूमिल कर रही है, बल्कि मंदाकिनी नदी और आसपास के पर्यावरण के लिए भी बड़ा खतरा पैदा कर रही है।
प्राकृतिक सौंदर्य के बीच कचरे का बढ़ता संकट
संगम व्यू प्वाइंट पहुंचने वाले पर्यटकों को जहां एक ओर प्रकृति की अनुपम छटा आकर्षित करती है, वहीं दूसरी ओर चारों तरफ फैली प्लास्टिक की बोतलें, खाद्य पदार्थों के रैपर, पॉलीथिन और अन्य अपशिष्ट निराश भी करते हैं। व्यू प्वाइंट के आसपास कई स्थानों पर कूड़े के ढेर साफ दिखाई देते हैं, जो यह दर्शाते हैं कि यहां नियमित सफाई और प्रभावी कचरा प्रबंधन व्यवस्था का अभाव है।
मंदाकिनी नदी तक पहुंच रहा कचरा
भूगोलवेत्ता प्रवीण रावत के अनुसार खुले में पड़ा कचरा बारिश और तेज हवाओं के कारण ढलानों के रास्ते नीचे बहकर मंदाकिनी नदी तक पहुंच रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि समय रहते स्थिति पर नियंत्रण नहीं किया गया तो नदी की स्वच्छता, जल गुणवत्ता और जलीय जीव-जंतुओं पर गंभीर दुष्प्रभाव पड़ सकते हैं।
पर्यावरणविदों का मानना है कि पर्वतीय क्षेत्रों में प्लास्टिक प्रदूषण का असर मैदानी इलाकों की तुलना में कहीं अधिक घातक होता है, क्योंकि यहां कचरे का वैज्ञानिक निस्तारण न होने पर वह सीधे जल स्रोतों और नदियों में पहुंच जाता है।
जंगलों और वन्यजीवों पर भी खतरा
स्थिति केवल नदी तक सीमित नहीं है। आसपास के वन क्षेत्रों में उड़कर पहुंच रहा प्लास्टिक और अन्य अपशिष्ट जंगलों के लिए भी गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। कई क्षेत्रों में वन्यजीवों द्वारा प्लास्टिक निगलने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। ऐसे में संगम व्यू प्वाइंट के आसपास बढ़ता कचरा स्थानीय जैव विविधता और वन्यजीवों के लिए भी खतरे की घंटी साबित हो सकता है।
प्रशासन ने विकास कार्यों का दिया आश्वासन
जिलाधिकारी विशाल मिश्रा ने बताया कि संगम व्यू प्वाइंट के समग्र विकास के लिए विस्तृत कार्ययोजना तैयार की जा रही है। उन्होंने कहा कि यहां सार्वजनिक शौचालय निर्माण की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। साथ ही सफाई व्यवस्था को मजबूत बनाने और वैज्ञानिक कचरा प्रबंधन प्रणाली विकसित करने के लिए भी आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं।
करोड़ों के पर्यटन दावों के बीच सुविधाओं का अभाव
स्थानीय लोगों और पर्यटकों का कहना है कि जिस स्थान पर प्रतिदिन सैकड़ों वाहन और हजारों लोग पहुंचते हैं, वहां पर्याप्त डस्टबिन, सार्वजनिक शौचालय, पेयजल सुविधा और नियमित सफाई जैसी मूलभूत व्यवस्थाएं उपलब्ध नहीं हैं।
स्थानीय निवासी पुष्पा किमोठी और अंकित राणा का कहना है कि सरकार पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, लेकिन इतने महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल पर ठोस कचरा प्रबंधन की स्थायी व्यवस्था अब तक नहीं बन पाई है। उनका कहना है कि जिला पंचायत और संबंधित विभाग कागजों में स्वच्छता के दावे तो करते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग दिखाई देती है।
‘स्वच्छ उत्तराखंड’ अभियान पर उठ रहे सवाल
राज्य सरकार एक ओर स्वच्छ और हरित उत्तराखंड की अवधारणा को बढ़ावा देने की बात करती है, वहीं दूसरी ओर प्रमुख पर्यटन स्थलों पर बढ़ती गंदगी इन दावों पर सवाल खड़े कर रही है। संगम व्यू प्वाइंट की वर्तमान स्थिति प्रशासनिक निगरानी और कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है।
पर्यावरण विशेषज्ञ देव राघवेंद्र बद्री का कहना है कि यदि तत्काल प्रभाव से वैज्ञानिक कचरा प्रबंधन, नियमित सफाई अभियान और पर्यटकों के लिए जागरूकता कार्यक्रम शुरू नहीं किए गए तो आने वाले वर्षों में मंदाकिनी नदी और आसपास का पर्यावरण अपूरणीय क्षति का सामना कर सकता है। उन्होंने जिला प्रशासन, जिला पंचायत और पर्यटन विभाग से संयुक्त कार्ययोजना बनाकर त्वरित कार्रवाई की मांग की है।
क्या बच पाएगी प्रकृति की यह अनमोल धरोहर?
सवाल यह है कि क्या प्रशासनिक घोषणाएं और प्रस्तावित योजनाएं समय पर धरातल पर उतर पाएंगी, या फिर प्रकृति की गोद में बसा यह खूबसूरत पर्यटन स्थल धीरे-धीरे गंदगी और प्लास्टिक प्रदूषण की भेंट चढ़ जाएगा। यदि जिम्मेदार विभागों ने जल्द ठोस कदम नहीं उठाए तो संगम व्यू प्वाइंट की पहचान उसकी प्राकृतिक सुंदरता नहीं, बल्कि कूड़े के ढेर और बदहाल व्यवस्थाओं के रूप में रह जाएगी।
मंदाकिनी नदी, आसपास के जंगल और आने वाली पीढ़ियां शायद इस लापरवाही की भारी कीमत चुकाने को मजबूर हों। ऐसे में समय रहते प्रभावी कदम उठाना न केवल पर्यावरण संरक्षण बल्कि उत्तराखंड की पर्यटन पहचान को बचाने के लिए भी बेहद जरूरी हो गया है।






