देहरादून: आयुष को बढ़ावा देने की दिशा में बड़ा कदम, सगंध पौध केंद्र शुरू करेगा मॉडर्न अरोमाथेरेपी ट्रेनिंग

देहरादून: भारत सरकार और उत्तराखंड सरकार आयुष चिकित्सा पद्धति को बढ़ावा देने पर विशेष जोर दे रही हैं, ताकि लोग प्राकृतिक उपचार पद्धतियों को अपनाएं और प्रदेश में पाई जाने वाली जड़ी-बूटियों का संरक्षण व सदुपयोग हो सके। इसी क्रम में उत्तराखंड उद्यान विभाग के अंतर्गत संचालित सगंध पौध केंद्र (कैप) ने मॉडर्न अरोमाथेरेपी को बढ़ावा देने की पहल की है।

अरोमाथेरेपी यानी सुगंध उपचार कोई नई पद्धति नहीं है, बल्कि इसका उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। आज भी सर्दी-जुकाम, सिरदर्द और तनाव जैसी छोटी-मोटी समस्याओं में लोग भाप लेने या तेल से मालिश जैसे घरेलू उपाय अपनाते हैं, जो अरोमाथेरेपी का ही एक रूप है।

बिना साइड इफेक्ट के प्राकृतिक उपचार पर जोर

सगंध पौध केंद्र के निदेशक नृपेंद्र चौहान ने बताया कि प्राचीन काल में सुगंध उपचार का सबसे बड़ा उदाहरण यज्ञ था। उस समय जड़ी-बूटियां जलाकर वातावरण को शुद्ध किया जाता था, लेकिन धुएं के कारण कुछ दुष्प्रभाव भी संभव थे।

अब मॉडर्न अरोमाथेरेपी में जड़ी-बूटियों को जलाने की आवश्यकता नहीं होती। पौधों और फूलों से निकाले गए एसेंशियल ऑयल का उपयोग मसाज या भाप (स्टीम) के रूप में किया जाता है। इससे धुआं शरीर में नहीं जाता और उपचार अधिक सुरक्षित व प्रभावी होता है।

उन्होंने बताया कि सिरदर्द, तनाव, त्वचा संबंधी समस्याएं, भावनात्मक असंतुलन, सर्दी-जुकाम, साइनस ब्लॉकेज, मांसपेशियों के दर्द और सूजन जैसी कई समस्याओं में अरोमाथेरेपी लाभकारी हो सकती है।

इसी उद्देश्य से सगंध पौध केंद्र 25-25 लोगों के बैच में प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू करने जा रहा है, जिसमें सही तेल और उसकी मात्रा के चयन की जानकारी दी जाएगी।

‘स्कूल ऑफ परफ्यूमरी’ की शुरुआत

नृपेंद्र चौहान ने बताया कि ‘स्कूल ऑफ परफ्यूमरी’ की शुरुआत भी कर दी गई है। इसके तहत युवाओं को छोटे बैच में प्रशिक्षण दिया जा रहा है। हालांकि, परफ्यूमरी की पूरी शिक्षा में लगभग तीन वर्ष का समय लगता है।

उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में बाजार में उपलब्ध अधिकांश सुगंध उत्पाद सिंथेटिक हैं, जिससे कई बार एलर्जी की समस्या हो जाती है। ऐसे में सगंध पौध केंद्र प्राकृतिक और हर्बल ऑयल आधारित उत्पाद तैयार करेगा, जिससे लोगों को सुगंध के साथ-साथ चिकित्सीय लाभ भी मिल सके।

चिकित्सीय परामर्श जरूरी

आयुर्वेद चिकित्सक डॉ. अर्चना कोहली ने बताया कि अरोमाथेरेपी वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति का हिस्सा है, जिसमें पौधों और फूलों से निकाले गए एसेंशियल ऑयल का उपयोग किया जाता है।

उन्होंने कहा कि सर्दी-जुकाम के दौरान बच्चों को भाप दिलाना भी इसी थेरेपी का एक रूप है। आयुर्वेद में भी दर्द निवारक और अन्य समस्याओं के लिए जड़ी-बूटियों से बनी दवाइयों से मालिश की सलाह दी जाती है।

हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी थेरेपी या दवा का उपयोग करने से पहले चिकित्सकीय परामर्श अवश्य लेना चाहिए।

उत्तराखंड से शुरू हो रही यह पहल आने वाले समय में देशभर में प्राकृतिक और सुरक्षित उपचार पद्धतियों को नई दिशा दे सकती है।

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