उत्तरकाशी: उत्तराखंड का विश्व प्रसिद्ध दयारा बुग्याल इन दिनों लगातार बढ़ते भू-धंसाव और भूस्खलन की गंभीर समस्या से जूझ रहा है। करीब 406 हेक्टेयर में फैले इस हिमालयी घास के मैदान में जगह-जगह गहरी खाइयां बन रही हैं, जिससे न केवल इसकी प्राकृतिक सुंदरता और जैव विविधता पर खतरा मंडरा रहा है, बल्कि हर वर्ष पापड़गाड घाटी में भारी मात्रा में मलबा पहुंचने से निचले क्षेत्रों में आपदा का जोखिम भी बढ़ता जा रहा है। स्थानीय जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों ने सरकार व वन विभाग से दयारा बुग्याल के संरक्षण के लिए दीर्घकालिक और वैज्ञानिक योजना लागू करने की मांग की है।
क्यारक गांव के पूर्व प्रधान विपिन राणा ने बताया कि वर्ष 2012-13 की आपदा के बाद से ही इस क्षेत्र में भू-धंसाव की आशंका बनी हुई थी। हालांकि, पिछले दो-तीन वर्षों में स्थिति काफी गंभीर हो गई है। धियाणा बुग्याल के समीप नहेटा और चिलपाड़ा क्षेत्रों में तेजी से भू-क्षरण हो रहा है, जिसके कारण बड़ी-बड़ी खाइयां बन चुकी हैं। इन क्षेत्रों से बहकर आने वाला मलबा हर साल पापड़गाड घाटी में पहुंचकर आपदा जैसी स्थिति पैदा कर रहा है।
समुद्र तल से करीब 11 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित दयारा बुग्याल के निचले हिस्सों—धियाणा, बरनाला, गोई, नहेटा और चिलपाड़ा—में लगातार भू-धंसाव के कारण जमीन दरक रही है। इसका असर अब केवल बुग्याल तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि रैथल और क्यारक गांवों से लेकर गंगोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग तक देखने को मिल रहा है। कई स्थानों पर संपत्तियों को नुकसान पहुंचने की भी जानकारी सामने आई है।
विपिन राणा का कहना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में यह समस्या और विकराल रूप ले सकती है। उनका कहना है कि भू-धंसाव के कारण दयारा बुग्याल की समृद्ध जैव विविधता भी प्रभावित हो रही है, जो पर्यावरण और पर्यटन दोनों के लिए चिंता का विषय है।
वन विभाग ने इससे पहले वर्ष 2020 में भारतीय वन्यजीव संस्थान और यूसैक (USAC) के सहयोग से प्रभावित क्षेत्र में लगभग 600 मीटर तक जूट और नारियल के रेशों से बने केयर नेट तथा पिरूल के चेक डैम लगाकर भू-क्षरण रोकने का प्रयास किया था। यह प्रयोग काफी हद तक सफल भी रहा। लेकिन वर्ष 2024 और 2025 में नहेटा, चिलपाड़ा और अन्य क्षेत्रों में फिर से बड़े पैमाने पर भू-धंसाव और भूस्खलन देखने को मिला, जिससे नई चुनौतियां सामने आ गई हैं।
उत्तरकाशी वन प्रभाग के प्रभागीय वनाधिकारी (डीएफओ) डीपी बलूनी ने बताया कि वन विभाग लगातार जूट केयर नेट और अन्य पर्यावरण अनुकूल उपायों के माध्यम से बुग्याल संरक्षण का कार्य कर रहा है। पूर्व में किए गए सुरक्षात्मक कार्यों से सकारात्मक परिणाम मिले थे। अब भारतीय वन्यजीव संस्थान और अन्य विशेषज्ञों के सहयोग से दयारा बुग्याल के संरक्षण के लिए एक विस्तृत और दीर्घकालिक योजना तैयार की जा रही है।
लगातार हो रहे भू-धंसाव के कारण बुग्याल से बहने वाली मिट्टी और मलबा पापड़गाड नदी में पहुंच रहा है, जिससे नदी तंत्र और आसपास के क्षेत्रों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। वहीं नहेटा के घने जंगलों में भी भूस्खलन के कारण वन संपदा को नुकसान पहुंच रहा है। दयारा बुग्याल ट्रैक के प्रमुख पड़ाव धियाणा, बरनाला और गोई क्षेत्रों में खुले मैदान अब गहरी खाइयों में तब्दील होते जा रहे हैं।
बार्सू की प्रधान दीपा रावत ने भी बरनाला क्षेत्र में तेजी से बढ़ रहे भू-धंसाव और भूस्खलन पर चिंता जताते हुए वन विभाग से दीर्घकालिक संरक्षण योजना तैयार करने की मांग की है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते प्रभावी वैज्ञानिक उपाय नहीं किए गए तो उत्तराखंड की इस विश्व प्रसिद्ध प्राकृतिक धरोहर को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है।







