चमोली: हिमालय महाकुंभ के रूप में विख्यात मां नंदा की बड़ी जात यात्रा शनिवार को सिद्धपीठ कुरुड़ से कैलाश के लिए विधिवत रवाना हो गई। मां नंदा की डोली के प्रस्थान के साथ ही पूरा क्षेत्र “जय मां नंदा” के जयकारों से गूंज उठा। यात्रा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए और मां नंदा से सुख-समृद्धि तथा क्षेत्र की खुशहाली की कामना की।
पांच दिवसीय अनुष्ठान के बाद दी गई विदाई
सिद्धपीठ कुरुड़ में मां नंदा राजराजेश्वरी की पांच दिनों तक विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान संपन्न किए गए। इसके बाद पारंपरिक रीति-रिवाजों और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच मां की डोली को कैलाश के लिए विदा किया गया।
डोली की विदाई के दौरान भावुक माहौल देखने को मिला। श्रद्धालुओं ने मां नंदा के दर्शन कर आशीर्वाद लिया और यात्रा के सफल एवं मंगलमय होने की प्रार्थना की। कई श्रद्धालुओं की आंखें भी नम हो गईं।
विश्व की सबसे लंबी पैदल धार्मिक यात्राओं में शामिल
मां नंदा देवी की यह यात्रा विश्व की सबसे लंबी पैदल धार्मिक यात्राओं में गिनी जाती है। करीब 280 किलोमीटर लंबी इस यात्रा का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। सामान्य लोकजात यात्रा के दौरान मां नंदा की डोली विभिन्न गांवों और पड़ावों से होते हुए वेदनी कुंड तक पहुंचती है, लेकिन इस बार बड़ी जात यात्रा के तहत डोली को सीधे होमकुंड तक ले जाया जाएगा।
यात्रा के दौरान विभिन्न धार्मिक स्थलों और पड़ावों पर पूजा-अर्चना तथा पारंपरिक अनुष्ठान आयोजित किए जाएंगे। अंतिम पड़ाव पर होमकुंड में विशेष पूजा के साथ यात्रा का समापन होगा।
विभिन्न पड़ावों से होकर हिमालय की ओर बढ़ेगी यात्रा
कुरुड़ से रवाना होने के बाद मां नंदा की डोली निर्धारित पड़ावों से होते हुए हिमालयी क्षेत्रों की ओर अग्रसर होगी। यात्रा मार्ग में आने वाले गांवों में श्रद्धालु पारंपरिक तरीके से मां की डोली का स्वागत करेंगे और पूजा-अर्चना कर आशीर्वाद प्राप्त करेंगे।
चमोली सहित प्रदेश के विभिन्न जिलों से श्रद्धालु यात्रा में शामिल होने के लिए पहुंच रहे हैं। ढोल-दमाऊं और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज के बीच पूरा वातावरण भक्तिमय बना हुआ है।
12 वर्ष बाद बड़ी जात को लेकर उत्साह
मां नंदा की बड़ी जात यात्रा को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखने को मिल रहा है। लंबे अंतराल के बाद आयोजित हो रही इस यात्रा को उत्तराखंड की सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में से एक माना जाता है। हजारों श्रद्धालु इस यात्रा को मां नंदा की कैलाश विदाई के रूप में देखते हैं और इसमें शामिल होकर खुद को सौभाग्यशाली मानते हैं।
इस बार क्यों चर्चा में है बड़ी जात यात्रा?
इस वर्ष यात्रा को लेकर नौटी आयोजन समिति और कुरुड़ पक्ष के बीच मतभेद भी चर्चा का विषय बने हुए हैं। नौटी आयोजन समिति इस बार नंदा राजजात यात्रा की तैयारी कर रही थी, लेकिन मलमास का हवाला देते हुए यात्रा को स्थगित कर दिया गया।
वहीं, कुरुड़ पक्ष ने यात्रा के प्रारंभिक पड़ावों और परंपराओं को लेकर आपत्ति जताते हुए अपनी ओर से बड़ी जात यात्रा निकालने का निर्णय लिया। उनका कहना है कि इस यात्रा का मूल स्वरूप और नाम “बड़ी जात” है, जबकि बाद में इसे “राजजात” के रूप में प्रचारित किया गया।
कुरुड़ पक्ष का मानना है कि यात्रा की धार्मिक परंपराओं में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है और इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने इस वर्ष बड़ी जात यात्रा का आयोजन किया है।
आस्था और संस्कृति का अद्भुत संगम
मां नंदा की बड़ी जात यात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि उत्तराखंड की लोक संस्कृति, परंपराओं और सामूहिक आस्था का प्रतीक भी है। हिमालय की कठिन वादियों से होकर गुजरने वाली यह यात्रा श्रद्धा, समर्पण और प्रकृति के साथ आध्यात्मिक जुड़ाव का अनूठा उदाहरण मानी जाती है।
आने वाले दिनों में यात्रा विभिन्न पड़ावों से होते हुए होमकुंड पहुंचेगी, जहां विशेष पूजा-अर्चना के साथ इसका धार्मिक समापन किया जाएगा।







